मैं रिया हूँ। लोग मुझे आज एक सफल महिला उद्यमी के तौर पर जानते हैं, लेकिन मेरी असली कहानी तो वो है जो मैंने कभी किसी को पूरी तरह नहीं बताई — एक ऐसी कहानी जो ना किसी से शुरू हुई, ना किसी पर खत्म… बस मैं थी, और मेरा सफर। मैं एक छोटे से गाँव में पैदा हुई थी। वो गाँव जहाँ सुबहें हल्की धूप के साथ आंगन में बैठकर चाय पीते हुए बीतती थीं, और शामें मिट्टी की सोंधी खुशबू के साथ चूल्हे पर रोटियाँ सेंकते हुए। वहाँ सपनों की कोई कीमत नहीं थी, बस रिवाज थे और जिम्मेदारियाँ। मैं बचपन से ही थोड़ी अलग थी — दूसरों की तरह गुड़ियों से नहीं खेलती थी। मुझे पुराने अख़बार पढ़ना पसंद था, दीवारों पर चॉक से लिखना, पेड़ की छांव में बैठकर आकाश को ताकना। मेरे पापा कहते थे, "बड़ी अजीब है ये लड़की, ना नखरे, ना मांगें। बस खामोश रहती है।" शायद वो नहीं समझ पाए कि मेरी खामोशी के पीछे एक दुनिया थी — मेरी खुद की बनाई हुई दुनिया, जिसमें मैं उड़ती थी, बिना पंखों के। गाँव के स्कूल में जब मैं पढ़ने जाती थी तो कई बार लड़कियाँ हँसती थीं — "अरे इसकी चप्पल तो फटी है!", "किताबें भी कितनी पुरानी ह...