सुबह के 4 बजे थे। हर तरफ हल्की नीली रोशनी फैल रही थी। मैं ऋषिकेश में था, एक छोटे से धर्मशाला के कमरे में, जहाँ खिड़की से बहती गंगा की आवाज़ सीधा दिल को छू रही थी। बाहर कुछ भक्त सुबह की आरती के लिए गंगा किनारे जा रहे थे। एक साधु पास से निकले – गेरुए वस्त्र, हाथ में कमंडल, माथे पर चंदन और आँखों में स्थिर शांति। उनके पीछे कुछ युवक थे, जो नंगे पाँव चले जा रहे थे, “हर हर महादेव” की आवाज़ के साथ। "मैं भी उसी सफर पर था – Kedarnath Yatra." बस में बैठते हुए मुझे कुछ बुज़ुर्ग महिलाएं दिखीं, जो साथ बैठीं और कहने लगीं – “बेटा, ये मेरी चौथी यात्रा है, पर हर बार ऐसा लगता है जैसे पहली बार जा रही हूँ।” उनकी आँखों में उत्साह और चेहरे पर थकान भी थी – पर मन में भक्ति। गाड़ी चल पड़ी। ऋषिकेश से श्रीनगर, फिर गुप्तकाशी – रास्ते में ऊँचे पहाड़, गहरी घाटियाँ, देवदार के पेड़ और बीच-बीच में भागीरथी और अलकनंदा का संगम। कहीं कहीं छोटे मंदिर, और हर मोड़ पर एक तिब्बती बाबा की चाय की दुकान। चाय का स्वाद अलग ही होता है वहाँ – दूध कम, अदरक ज्यादा, और उसमें हवा की ठंडक घुली होती है। गुप्तकाशी में पहली रात रुका...