मैं एक छोटे से गाँव में पैदा हुई थी। वो गाँव जहाँ सुबहें हल्की धूप के साथ आंगन में बैठकर चाय पीते हुए बीतती थीं, और शामें मिट्टी की सोंधी खुशबू के साथ चूल्हे पर रोटियाँ सेंकते हुए। वहाँ सपनों की कोई कीमत नहीं थी, बस रिवाज थे और जिम्मेदारियाँ।
मैं बचपन से ही थोड़ी अलग थी — दूसरों की तरह गुड़ियों से नहीं खेलती थी। मुझे पुराने अख़बार पढ़ना पसंद था, दीवारों पर चॉक से लिखना, पेड़ की छांव में बैठकर आकाश को ताकना। मेरे पापा कहते थे, "बड़ी अजीब है ये लड़की, ना नखरे, ना मांगें। बस खामोश रहती है।"
शायद वो नहीं समझ पाए कि मेरी खामोशी के पीछे एक दुनिया थी — मेरी खुद की बनाई हुई दुनिया, जिसमें मैं उड़ती थी, बिना पंखों के।
गाँव के स्कूल में जब मैं पढ़ने जाती थी तो कई बार लड़कियाँ हँसती थीं — "अरे इसकी चप्पल तो फटी है!", "किताबें भी कितनी पुरानी हैं।"
मगर मुझे फर्क नहीं पड़ता था। मेरे पास वो था जो किसी के पास नहीं था — खुद पर यकीन।
मैंने दसवीं की परीक्षा में पूरे जिले में टॉप किया। अखबार में मेरा नाम आया। एक फटी पुरानी फोटो के साथ — ‘गांव की बेटी की बड़ी उड़ान।’
माँ ने मेरी फोटो आंगन की दीवार पर टाँग दी, और पहली बार पापा ने मुझे देखकर कहा, “शायद तू सच में कुछ बन सकती है।”
कॉलेज जाने के लिए गाँव छोड़ना पड़ा। शहर पहली बार बहुत डरावना लगा। यहाँ ना माँ थी, ना वो आंगन, ना आम का पेड़। सिर्फ ऊँची बिल्डिंगें थीं, तेज़ आवाज़ें और अजनबी चेहरे।
लेकिन मैंने खुद को टूटने नहीं दिया।
मैंने हॉस्टल में रहकर पढ़ाई की। खुद रोटियाँ बनाई, खुद कपड़े धोए, और कभी-कभी खुद को भी समझाया कि रो लेना भी ठीक होता है। बहुत बार हिम्मत छूटी, लेकिन अंदर से एक आवाज़ आती रही — "रिया, तू सिर्फ़ अपनी नहीं, उन सब लड़कियों की उम्मीद है जो कभी बोल नहीं पाईं।"
डिग्री पूरी हुई, नौकरी मिली। छोटी तनख्वाह थी, लेकिन संतोष बड़ा था। पहले महीने की तनख्वाह से मैंने माँ को साड़ी भेजी थी। जब उन्होंने पहनी, तो फोन पर सिर्फ रोईं — कुछ कहा नहीं। लेकिन मुझे समझ आ गया था, कुछ बातें कहने की ज़रूरत नहीं होती।
वक़्त बीतता गया। मैंने धीरे-धीरे तरक्की की। फिर एक दिन सोचा — मैंने अब तक जो कुछ सीखा, वो मैं किसी और को क्यों न दूँ?
मैंने एक डिजिटल लर्निंग सेंटर शुरू किया — गाँव की लड़कियों के लिए। ऑनलाइन कक्षाएं, स्कॉलरशिप, और सबसे जरूरी — उन्हें ये विश्वास देना कि वे भी उड़ सकती हैं।
आज मेरे सेंटर में सौ से ज़्यादा लड़कियाँ पढ़ती हैं। हर बार जब कोई लड़की मुस्कुरा कर कहती है, “मैडम, मैं भी रिया बनना चाहती हूँ,” तो मैं रो पड़ती हूँ — भीतर ही भीतर।
अब मैं 35 की हो चुकी हूँ। ना शादी की, ना कभी किसी से ज्यादा जुड़ी। लोग पूछते हैं — "क्या तुझे अकेलापन नहीं लगता?"
मैं मुस्कुरा देती हूँ। क्या कहूँ उनसे? कैसे बताऊँ कि मैंने खुद को ही सबसे अच्छा साथी बनाया है।
मेरी ज़िंदगी में कोई प्रेम कहानी नहीं थी, कोई नायक नहीं था, कोई फिल्मी मोड़ नहीं। बस मैं थी, मेरी माँ की दी हुई हिम्मत थी, और हर रोज़ खुद से किया गया एक छोटा वादा — “रिया, तू थमेगी नहीं।”
आज जब मैं अपनी डायरी खोलती हूँ और आखिरी पन्ने पर लिखती हूँ:
"कुछ सपने ताज पहनकर नहीं, धूल में चलकर पूरे होते हैं।"
"कुछ कहानियाँ तालियों के लिए नहीं, आत्मा की शांति के लिए होती हैं।"
"और कुछ ज़िंदगियाँ एकतरफा होती हैं — लेकिन उनमें हर मोड़ पर कविता बसती है।"
तो मुझे महसूस होता है — मेरी कहानी भले ही अनकही रही हो, लेकिन वो अधूरी नहीं रही।
✍️ – रिया
(जो आज भी हर उस लड़की में ज़िंदा है, जो खुद से कहती है – मैं कर सकती हूँ।)


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